संस्थापक

मौलाना अबुल कलाम मुहीयुद्दीन अहमद (11 नवंबर 1888 - 22 फ़रवरी 1958) भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अग्रणी नेताओं में से एक थे। वह एक महान विद्वान और कवि भी थे। उन्हें स्वतंत्र भारत के प्रथम शिक्षा मंत्री के रूप में नियुक्त किया गया था और भारत के संविधान का मसौदा तैयार करने के लिए संविधान सभा में शामिल किया गया था। मौलाना आजाद के कार्यकाल के अंतर्गत, प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा, वैज्ञानिक शिक्षा, विश्वविद्यालयों की स्थापना और अनुसंधान और उच्च शिक्षा के अवसरों को बढ़ावा देने के उपाय शुरू किए गए थे। मौलाना ने साहित्य अकादमी, संगीत नाटक अकादमी, ललित कला अकादमी और भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद् जैसे कई संस्थानों की स्थापना की, और भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों की स्थापना को बहुत प्रोत्साहन दिया। मौलाना आजाद की मृत्यु एक क्षति थी जिसे देश में गंभीरता से महसूस किया गया। पंडित जवाहरलाल नेहरू ने संसद में मौलाना को श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि "हमारे पास महान पुरुष हैं और हमें महान पुरुष मिलते रहेंगे, लेकिन मौलाना आजाद ने विशिष्‍ट और विशेष प्रकार की महानता का प्रतिनिधित्व किया है जो भारत में या कहीं और इसके पुन: उत्‍पन्‍न होने की संभावना नहीं है।"

आजाद को अपने समय के प्रमुख भारतीय राष्ट्रवादियों के रूप में याद किया जाता है। वह आधुनिक भारत में सांप्रदायिक सद्भाव के सबसे प्रेरणादायक प्रतीकों में से आज भी एक हैं। भारत में शिक्षा और सामाजिक उत्थान के उनके काम का भारत के आर्थिक और सामाजिक विकास के मार्गदर्शन में एक महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ा। राष्ट्र के प्रति उनके अमूल्य योगदान के लिए मौलाना अबुल कलाम आजाद को 1992 में मरणोपरांत भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया गया।
"मैं एक मुस्लिम हूं और इस तथ्‍य के लिए पूरी तरह सजग हूं कि मुझे पिछले तेरह सौ साल की इस्लाम की गौरवशाली परंपरा विरासत में मिली है। मैं विरासत का एक छोटा सा हिस्सा भी खोने के लिए तैयार नहीं हूँ। इस्‍लाम के इतिहास और शिक्षाओं, इसके कला और साहित्‍य, इसकी संस्कृति और सभ्यता मेरे धन का हिस्सा हैं और इनका पोषण करना और रक्षा करना मेरा कर्तव्‍य है ... लेकिन इन भावनाओं के साथ मेरे पास जीवन के अनुभव से उत्‍पन्‍न गहरा अहसास है जिसे इस्‍लामी भावना से मजबूती ही मिली और कोई बाधा नहीं हुई। मुझे इस तथ्य का भी उतना ही गर्व है कि मैं एक भारतीय हूं और भारतीय राष्ट्रवाद की अविभाज्य एकता, इसे सकल बनाने में एक महत्‍वपूर्ण कारक, का एक अनिवार्य अंग हूं जिसके बिना यह महान भवन अधूरा ही रहेगा। मैं एक अनिवार्य तत्व हूँ जो भारत का निर्माण करने के लिए चला है। मैं इस दावे को कभी नहीं छोड़ सकता।"--- मौलाना अबुल कलाम आज़ाद।