Prof. Lokesh Chandra

प्रो. लोकेश चन्द्र का जन्‍म भारत के हरियाणा राज्य में अम्बाला में वर्ष 1927 में शिक्षाविदों के एक प्रतिष्ठित परिवार में हुआ था। उनके पिता, प्रो. रघु वीर, विश्‍व प्रसिद्ध विद्वान और विचारक थे जिन्‍होंने एशियाई संस्कृति की समझ और भारत के भाषायी विकास के लिए सांकेतिक योगदान दिया। प्रोफेसर चन्द्र ने उनके मार्गदर्शन में शास्त्रीय यूनानी, लैटिन, चीनी, जापानी, पारसियों की अवेस्ता, पुरानी फारसी और सांस्कृतिक महत्व की अन्य भाषाओं के अलावा संस्कृत, भारत की शास्त्रीय भाषा और उसके व्युत्पादों (डेरिवेटिव) पाली और प्राकृत का अध्ययन किया। वर्ष 1943 में उन्होंने "भारतीय भौगोलिक नाम का चीनी शब्दकोश" के अनुवाद में अपने पिता की सहायता की जिसको चाइनीज लिट्रेचर एंड एकाउंट्स ऑफ ट्रेवलर्स से 517 ईस्वी में संकलित किया गया था।

प्रो. चन्द्र ने बंगाली, उडिया, गुजराती, कन्नड़, तमिल और मलयालम जैसी कई भारतीय भाषाओं का अध्ययन किया। अपने विश्वविद्यालय के दिनों के दौरान उन्‍होंने रसायन शास्त्र, भौतिकी, गणित, वनस्पति विज्ञान, जूलॉजी और उनके नतीजों में भारतीय भाषाओं के लिए वैज्ञानिक शब्दावली में अपने पिता के साथ सहयोग किया।

उन्होंने लाहौर में पंजाब विश्वविद्यालय से वर्ष 1947 में मास्टर डिग्री (एमए) हासिल कीं। वर्ष 1948 और 1949 के दौरान उन्‍होंने नई खोजी गई पांडुलिपियों की सहायता से वैदिक कार्य जैमिनिया ब्राह्मण की गवमायना भाग को गुण-दोष की दृष्टि से संपादित किया। प्रो. चंद्र ने इस पाठ को इसकी मूल शुद्धता में लाने में कोई श्रम और समय नहीं छोड़ा। इन योगदानों को मान्यता देने के लिए वर्ष 1950 में उन्‍हें उट्रेच राज्य विश्वविद्यालय (नीदरलैंड) द्वारा साहित्य और दर्शन के डॉक्टर की डिग्री से सम्मानित किया गया।

वर्ष 1954 में, उन्‍होंने जैमिनिया ब्राह्मण के संपूर्ण पाठ का आलोचनात्मक संस्करण पूर्ण किया। वर्ष 1955 से 1960 तक प्रो. लोकेश चन्द्र ने 12 + 7 अनुपूरक संस्करणों में एक "तिब्बती-संस्कृत शब्दकोश" तैयार किया जो तिब्बती साहित्य और संस्कृति को समझने के लिए सबसे पहला व्यापक कोशरचना के रूप में प्रयास है जिसका बोलबाला उच्‍चतर एशिया की दूरस्थ आबादी तक बढ़ा।

प्रो. लोकेश चन्द्र ने तसवा तमदिन द्वारा "द गोल्‍डन एनल्‍स ऑफ मंगोलिया" के अलावा समये के इतिहास, पहले तिब्बत के मठ और 19 मंगोलियाई बहुश्रुत पर अध्ययन सहित तिब्बती ऐतिहासिक ग्रंथों के कई संस्करणों का संपादन किया है।

उनके "तिब्बती साहित्य के इतिहास के लिए सामग्री" के तीन-खंड सदियों की उन्‍नति के माध्यम से बर्फ की भूमि और मंगोलियाई मैदान के बौद्धिक जीवन का विशाल आयाम दिखाती है।

प्रो. लोकेश चन्द्र ने अपने पिता प्रो. रघु वीर के साथ सहयोग किया और साइबेरियाई और वोल्गा क्षेत्रों तक ट्रांस-हिमालय एशिया की प्रतिमा विज्ञान संबंधी कला के अज्ञात पहलुओं पर जानकारी का खजाना उपलब्ध कराने के लिए 20 खंडों में "न्‍यू तिब्बतो-मंगोल पेंथेओन" पूरा किया।

वैदिक परंपरा में निहित भारत की आध्यात्मिक अभिव्यक्ति की सबसे प्राचीन समझ के साथ शुरू करते हुए प्रो. लोकेश चन्द्र ने भारत, तिब्बत, मंगोलिया, चीन, कोरिया, जापान, दक्षिण पूर्व एशिया, और फिलीपींस के बीच मुलकात की तरफ रूख किया। मोगोलिअन कंजर या बुद्धिस्ट कैनन के 108 बड़े खंडों के उनके संस्करण को हंगरी एकेडमी ऑफ साइंसेज ने एक उत्कृष्ट उपलब्धि के रूप में मान्यता दी जिसके लिए उन्‍हें अकादमी के एक मानद सदस्य के रूप निर्वाचित किया गया। ऐसा सौ साल बाद हुआ कि एक भारतीय को इसके परिषत्सदस्य से सम्मानित किया गया।

प्रो. लोकेश चन्द्र की रूचि प्राकृतिक विज्ञान के क्षेत्र में भी बढ़ी है। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिका "अड्वान्सिंग फ्रंटियर्स ऑफ़ प्लांट साइंसेज" (खंड 1-30) का संपादन किया है जिसमें पादप आकृति विज्ञान और शरीर विज्ञान पर मूल कार्य, व्यवस्थित वनस्पति विज्ञान, पादप विकृतिविज्ञान, आर्थिक वनस्पति विज्ञान, पादप कोशिका विज्ञान और आनुवंशिकी, बागवानी, पैलियो वनस्पति विज्ञान और पादप विज्ञान के अन्य क्षेत्र शामिल हैं।

भारत के माननीय राष्ट्रपति द्वारा 27 अक्टूबर, 2014  से प्रो. लोकेश चन्द्र को भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद् के अध्यक्ष के रूप में नियुक्‍त किया गया है। प्रो. चन्‍द्र भारतीय संस्कृति की अंतरराष्‍ट्रीय अकादमी, एशियाई संस्कृतियों के लिए एक प्रमुख अनुसंधान संस्था, के मानद निदेशक हैं। अतीत में, उन्‍होंने भारतीय ऐतिहासिक अनुसंधान परिषद् के अध्यक्ष, भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद् के उपाध्‍यक्ष सहित कई महत्वपूर्ण पदों पर कार्य किया है। वह 1974 से 1980 और 1980 से 1986 तक दो अवधियों के लिए संसद सदस्‍य (राज्य सभा) रह चुकें हैं।

वर्ष 2006 में उनको शैक्षणिक जीवन और सार्वजनिक संभाषण में उनके योगदान को पहचान देने के लिए भारत सरकार द्वारा 'पद्म भूषण', सबसे प्रतिष्ठित नागरिक सम्मान, से सम्मानित किया गया था।

उनके नाम 596 कार्य और पाठ संस्करण हैं। उनमें से तिब्बती-संस्कृत शब्दकोश, तिब्बती साहित्य के इतिहास के लिए सामग्री, तिब्बत का बौद्ध प्रतिमा विज्ञान और 15 खंडों में बौद्ध कला का उनका शब्दकोश जैसी कालजयी कृतियां हैं।

उन्होंने हाल ही में भारत-मंगोलियाई संबंधों पर चिंगिस खान के घास के मैदानों के पार बौद्ध धर्म, इंडोनेशिया पर स्वर्ण द्वीप समूह में बुद्ध और प्रभु शिव तथा भारत एवं जापान के बीच सांस्कृतिक संगम पर लिखा है। फिलहाल वह भारत और चीन के बीच पिछले दो हजार वर्षों के सांस्कृतिक आदान-प्रदान पर लिख रहे हैं। ये खंड बौद्ध कॉस्‍मॉपोलिस की कला और पुरातत्व, साहित्य और दर्शन पर चन्द्र के शोध को कवर करते हैं।

प्रो. लोकेश चन्द्र ने संपूर्ण यूरोप, एशिया और रूस की व्यापक रूप से यात्रा की है।